Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 70, Verses 1–4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 70, verses 1–4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 70 · श्लोक 1-4
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
अथ भूधरशृङ्गाभा सा महाकृष्णराक्षसी ।
कज्जलाम्बुदलेखेव तानवं गन्तुमुद्यता ॥ १ ॥
बभूवाभ्रोपमाकारा ततो विटपरूपिणी ।
पुंस्प्रमाणा ततोऽप्यासीदथाभूद्धस्तमात्रिका ॥ २ ॥
ततः प्रादेशमात्रा सा ततोऽप्यङ्गुलिरूपिणी ।
ततो माषशमीतुल्या ततः सूची बभूव ह ॥ ३ ॥
ततः कौशेयसूचित्वं पद्मकेसरसुन्दरी ।
प्राप सा शिखराकारा संकल्पाद्रिरिवाणुताम् ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, तदुपरान्त पर्वत के शिखर के समान विशाल,
कज्जलाकार मेघघटा के समान बड़ी काली वह राक्षसी सूक्ष्मता को प्राप्त होने लगी । पहले
वह मेघाकार हुई, तदनन्तर उसका देह-प्रमाण वृक्षकी शाखा के तुल्य हुआ, तदुपरान्त वह
मनुष्य के आकारवाली हुई, फिर उसका स्वरूप केवल हाथभर का बन गया, तदनन्तर वह
एक बिलस्त भर का हुआ, उसके बाद वह केवल एक अंगुलमात्र रह गई, तदनन्तर उडद की
छीमी के बराबर हुई और फिर वह सूचिका बन गई । सूचिका बनने के बाद जैसे संकल्पादि
अणुता को (अलक्ष्यता को) प्राप्त होता हे, वैसे ही शिखर के समान विशाल आकारवाली वह
रेशमी वस्त्र सीने योग्य अत्यन्त सूक्ष्म सुई बनकर पद्मकेसर के समान सुन्दरी हुई
सर्ग सन्दर्भ
उनहत्तरवाँ सर्ग समाप्त सत्तरवाँ सर्ग कर्कटी का क्रमशः शरीरकी सूक्ष्मतापूर्वक दो सूचिकाओं के रूप में गमनवर्णन और उसका प्राणियों के शरीर में प्रवेश वर्णन ।