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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 70, Verses 80–81

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 70, verses 80–81 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 70 · श्लोक 80,81

संस्कृत श्लोक

स्थापिता मलमादत्ते यथा मृद्धर्षणं विना । परापराधविरहाद्व्याधिस्तस्याः प्रवर्तते ॥ ८० ॥ सूक्ष्माऽदृश्या चैव दात्री क्षणाद्विस्मृतिमेति सा । तीक्ष्णभेदकरी क्रूरा सूची चेष्टेव दैविकी ॥ ८१ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे मिट्टी में घिसने के बिना चुपचाप रक्खी हुई सुई जंग लगने के कारण मलिन हो जाती है, वैसे ही सूचिका भी यदि परमारणरूप अपराध न करे, तो उसे व्याधिरूपी दुःख हो जाता हे । यह सूचिका सूक्ष्म अतएव अदृश्य होकर शरीर को काटनेवाली है और क्षणभर में विस्मृति को प्राप्त हो जाती है । तीक्ष्ण भेद करनेवाली दैवचेष्टा (औत्पात्ति की चेष्टा के) समान क्रूर है