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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 70, Verses 51–52

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 70, verses 51–52 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 70 · श्लोक 51,52

संस्कृत श्लोक

सायःसूची मनःसूच्या वलिता विजहार ह । दिक्ष्वाशेव शिलागुर्वी नावाङ्गपलिता सती ॥ ५१ ॥ विससार दिगन्तेषु सान्तःकरणसत्तया । तुषलेखेव पवनशक्त्या संसृतिरूपया ॥ ५२ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे बड़ी भारी शिला नाव द्वारा इधर उधर ले जाई जाती है, वैसे ही वृद्धावस्था में स्थित आशा के समान वह लोहमयी सूचिका जीवयुक्त सूचिका के सहारे दिशाओं में घूमती थी । जैसे धान आदि की भूसीका कण अपने भ्रमण को प्रगट करनेवाली पवनशक्ति से दिगन्तों में घूमता है, वैसे ही वह लोहमयी सूची भ्रमण को प्रकट करनेवाली अन्तःकरण की सत्ता से दिशाओं में घूमती थी