Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 70, Verses 82–84
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 70, verses 82–84 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 70 · श्लोक 82-84
संस्कृत श्लोक
तन्तुवेधनमात्रेण हतोऽन्य इति तोषिता ।
दुर्जनो येन तेनैव नाशितेनैति हृष्टताम् ॥ ८२ ॥
पङ्के मज्जति याति खं विहरति व्योमानिलैर्दिक्तटे शेते पांसुषु भूतलेष्विव वने पट्टे गृहेऽन्तःपुरे ।
हस्ते श्रोत्रसरोरुहेऽथ मृदुनि स्वेच्छोर्णिकाखण्डके रन्ध्रे काष्ठमृदां च माति हृदये द्रव्यात्मशक्त्यैव सा ॥ ८३ ॥
श्रीवाल्मीकिरुवाच ।
इत्युक्तवत्यथ मुनौ दिवसो जगाम सायंतनाय विधयेऽस्तमिनो जगाम ।
स्नातुं सभा कृतनमस्करणा जगाम श्यामक्षये रविकरैश्च सहाजगाम ॥ ८४ ॥
हिन्दी अर्थ
महामुनि को नमस्कार कर सायंकालीन सन्ध्या आदि के लिए स्नानार्थ चली गई, रात्रि समाप्त
होने पर दूसरे दिन सूर्य के किरणों के साथ फिर मुनि-सभा आ गई