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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 70, Verses 21–22

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 70, verses 21–22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 70 · श्लोक 21,22

संस्कृत श्लोक

एकवस्त्वतिरागाणामहो नु विषमा गतिः । देहोऽपि तृणवत्त्यक्तो राक्षस्या निजयेच्छया ॥ २१ ॥ एकवस्त्वतिगन्धेन भ्रश्यन्त्यन्या हि संविदः । राक्षस्या ग्रासगन्धेन देहनाशोऽपि नेक्षितः ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

एक वस्तु में अत्यन्त अनुराग करनेवाले लोगों की विषम अवस्था को तो देखिए,राक्षसी ने अपनी इच्छासे अपने शरीर का तृणवत्‌ त्याग कर दिया, एक वस्तु में अत्यन्त तृष्णा होने से अन्य प्रतीतियाँ नष्ट हो जाती हैं । जगत्‌-ग्रास में अत्यन्त अभिलाषा होने से राक्षसी ने अपने देहविनाश को भी नहीं देखा