Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 21
बीसवाँ सर्ग समाप्त इक्कीसवाँ सर्ग विचार॒पूर्वक देखा जाय तो स्थूल सूक्ष्म है, सूक्ष्म अविद्या है ओर अविद्या भी चिन्मात्र ही है, यों देवी द्वारा लीला का प्रतिबोधन ।
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- Verses 1–2श्रीदेवीजी विशेषरूप से प्रतिपादन करने के लिए पूर्वोक्त अर्थ का ही विस्तार करती है । श्रीद…
- Verses 3–6मायिक स्मरणाभास और अनुभवाभास में प्रसिद्ध स्मरण और अनुभव से विलक्षणता दशति हैं। जो वस्तु…
- Verse 7जो अनुभव में नहीं आया है, उसमें अनुभूतत्व भ्रान्ति कहाँ देखी गई है ? इस पर कहते हैं । अनन…
- Verse 8यदि कोड कहे कि संसार अनादिकाल से चला आ रहा है, इस अनादि संसार में सब कुछ अनुभूत ही है, अत…
- Verse 9पूर्व अनुभूत का ही भान होता है, ऐसा कोई नियम नहीं है, ऐसा कहती है । हे सुन्दरी, तीनों भुव…
- Verse 10काकतालीय के समान किन्हीं चिदणुओं को पूर्व में अननुभूत ब्रह्मत्व, स्मरण के बिना ही, प्रतीत…
- Verse 11वासनाओं की राशि ही चित्त है, चूँकि संसार वासनाराशिरूप चित्तमय है, अतः चित्तके विनाश से आत…
- Verses 12–13अहन्ता ओर जगत् की मूलभूत अविद्या के बाध के विना यह अनुत्पादमयी (नित्य) विमुक्तता उदित ही…
- Verse 14यदि कोके कि योग से मन की वृत्तिका शमन होने से ही वह शान्तो जायेगा, ज्ञान की उसके लिए क्या…
- Verse 15ज्ञान से ही इस संसार सागर से निस्तार हो सकता है, ऐसा कहती है । यह विशाल संसार पर ब्रह्म ह…
- Verse 16जो पहले यह कहा था कि यह सर्ग ब्राह्मण-ब्राह्मणी के सर्ग मे अभ्यस्त वासनाओ से उत्पन्न है,…
- Verse 17श्रीदेवीजी ने कहा : भद्रे, केवल संस्कार ही वासना नहीं है, आगे मैं संस्कार से अतिरिक्त (अन…
- Verse 18जिनका इस समय स्मरण हो रहा है, उन वस्तुओं के ब्राह्मणसृष्टि में न रहने से भी उनके स्मरण का…
- Verse 19पूर्व कल्प के ब्रह्मा की वासना से युक्त अविद्या का अविद्या के अधिष्ठानभूत तत्त्व के ज्ञान…
- Verse 20चूँकि ब्रह्मा स्वयं कल्पनामय है, अतएव उसका और उसकी सृष्टि का बाध होना युक्ति युक्त है, इस…
- Verse 21पूर्व अनुभव से उत्पन्न संस्कार से जनित अथवा अनादि अविद्याशक्तिरूप अन्य वासना से उत्पन्न ह…
- Verse 22कार्य-कारणविकल्प अविचाररूप माया द्वारा किया गया है, विचार करने पर उसका बाध हो जाता है, यह…
- Verse 23युक्ति से ऐसा भले ही हो, पर यह बात अनुभव में कैसे आरूढ हो सकती है, उसके लिए श्रीदेवीजी प्…
- Verse 24इस प्रकार प्रपंचाभाव अक्षुण्ण स्थित है, यों उपसंहार करती है । इस तरह कुछ भी उत्पन्न नहीं…
- Verses 25–27प्रत्यग्- दृष्टि से प्रबुद्ध हुई लीला ने कहा । लीला ने कहा : हे देवी, जैसे प्रातःकाल की…
- Verses 28–29हे देवी, जिस घर में वह ब्राह्मण ब्राह्मणी के साथ रहता था, उस सृष्टि में पर्वतीय ग्राम में…
- Verses 30–31तुम्हारे पूर्वोक्त प्रकार से निर्मल होने पर हम दोनों साथ-साथ किसी प्रकार के प्रतिबन्ध २>…
- Verses 32–34श्रीदेवीजी ने कहा : वत्से, ये जगत् मायामय होने के कारण अमूर्त हैं, लेकिन मिथ्याज्ञान से…
- Verse 35उक्त अर्थ में प्रमाणो की असंभावना का मूलोच्छेद करने के लिए दढतर प्रमाणों को दिखलाते हैं ।…
- Verse 36ब्रह्म ही ब्रह्म को देखता है ब्रह्म से भिन्न कदापि ब्रह्म को नहीं देख सकता, ब्रह्म की ही…
- Verse 37ब्रह्म और जगतों की कारणता और कार्यता नहीं हो सकती है, क्योकि सम्पूर्ण सहकारी कारणों का अभ…
- Verses 38–39अभ्यास न होने के कारण जबतक तुम्हारी भेदबुद्धि शान्त नहीं होती, तबतक तुम निश्चय अब्रह्मरूप…
- Verse 40मनोरथ से गढ़े गये नगर के समान मेरा शरीर आकाशमय (शुद्धचित्ताकाशमय) है, इस देह से मैं ब्रह्…
- Verse 41भद्रे, जैसे मैं देखती हूँ, वैसे ही ये ब्रह्मा आदि भी विशुद्ध चित्तरूपी देह से ब्रह्मदर्शन…
- Verses 42–43यह देह केवल अन्य सृष्टि के दरवाजे पर जाने में ही प्रतिबन्धक नहीं है । किन्तु तत्त्वज्ञान…
- Verse 44इस देह से उसकी जो प्राप्ति नहीं होती, उसमें हेतु है, उसका संकल्पजन्य होना इस बात को कैमुत…
- Verse 45देह से साध्य अथवा देह से असाध्य जो संकल्प नगर का व्यवहार उसके उपभोग के प्रति संकल्पनगर सत…
- Verse 46ब्रह्मा के संकल्प से उत्पन्न इस जगत् का हमारे संकल्प से जनित (सांकल्पिक) नगर से कोई अन्त…
- Verses 47–48लीला ने कहा : हे देवि आपने कहा है कि ब्राह्मण ओर ब्राह्मणी के जगत् में तुम और हम साथ ही…
- Verses 49–50श्रीदेवीजी ने कहा : भद्रे, जैसे तुम्हारा संकल्पमय आकाशवृक्ष सांकल्पिक सत्ता से सत् होता…
- Verse 51मेरा यह शरीर इस प्रकार का है, अतएव तुम्हारी नाई इसका परित्याग करके मैं नहीं जाती हूँ । जै…
- Verses 52–53यदि ऐसी बात है तो मेरे पति की संकल्पजनित सृष्टि से इसका (मेरी देहका) संयोग कैसे हुआ, इस प…
- Verses 54–55तब तो मेरा शरीर भी वस्तुतः मनोमात्र होने से आपके शरीर का सजातीय ही ठहरा, इसलिए आपके शरीर…
- Verse 56तो कब इसके पार्थिवभाव की (पृथिवी विकारता की) निवृत्ति होगी ? इस प्रश्न पर देवीजी कहती हैं…
- Verse 57अन्य लोगों के स्थूलदेह का नाश दिखलाई देता है, अतएव जीवन्मुक्त के शरीर का भी नाश ही संभावि…
- Verse 58तत्त्वज्ञानी का शरीर ज्ञान से बाधित हो जाता है, अतः वह जले हुए वस्त्र के समान है ही नहीं।…
- Verse 59बेटी, यथार्थज्ञान होने से रस्सी में सर्प की भ्रान्ति के निवृत्त होने पर सर्पका विनाश नहीं…
- Verse 60जैसे सत्य के परिज्ञान से रज्जु में सर्प नहीं दिखलाई देता वैसे आतिवाहिक शरीर के ज्ञान से आ…
- Verse 61गौड़पादाचार्य ने भी कहा है : विकल्पो विनिवर्तेत कल्पितो यदि केनचित् । उपदेशादयं वादो ज्ञ…
- Verse 62तब आप लोग अपने शरीर को कैसे देखते हैं, यह प्रश्न होने पर देवीजी कहती है । परम ब्रह्म से प…
- Verse 63यदि शंका हो कि चिति तो अद्वृश्य है, यह दश्यसत्वरूपता को कैसे प्राप्त हुई, तो इस पर कहते ह…
- Verse 64जो पहले यह कहा था कि कलन नामक प्रथम विकार के अधीन ही तो सम्पूर्ण कल्पना होती है, उस कलना…
- Verses 65–68तुमने ऊपर जो दोष कहा है, वह विकार को सत्य मानने पर ही होता है, मिथ्या मानने पर नहीं होता,…
- Verse 69जो कुछ भी यह दृश्य प्रपंच प्रतीत हो रहा है, वह सब ब्रह्म का विशुद्ध विकास है। पर जैसे श्र…
- Verses 70–72विचार से बाध्य होने के कारण विचार विरोधी अविचार शब्द से वाच्य मोह ने ही उक्त भ्रम में लोग…
- Verse 73कितने काल तक तुमने इसका विचार नहीं किया, इसीलिए तुम्हें बोध नहीं हुआ, अतएव तुम ब्रह्म में…
- Verse 74ज्ञान से द्वैतवासना का बाध होने पर तत्त्ववासना का शेष रहना ही वासना की अल्पता है, वही मुक…
- Verse 75यदि कोई कहे कि फिर द्वैतवासना का अंकुर हो जायेगा, तो उस पर कहती है । संसार नामक यह दृश्य…
- Verses 76–79अध्ययनरूप परम निर्विकल्प समाधि के मन में आरूढ होने पर द्रष्टा, दुश्य और दृष्टि का अत्यन्त…