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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 21, Verse 64

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 21, verse 64 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 64

संस्कृत श्लोक

लीलोवाच । एकस्मिन्नेव संशान्ते दिक्कालाद्यविभागिनि । विद्यमाने परे तत्त्वे कलनावसरः कुतः ॥ ६४ ॥

हिन्दी अर्थ

जो पहले यह कहा था कि कलन नामक प्रथम विकार के अधीन ही तो सम्पूर्ण कल्पना होती है, उस कलना में ही लीला अनुपपत्ति की शंका करती है । लीला ने कहा : देवी, देश और काल आदि के विभागसे रहित नित्यविद्यमान परतत्त्व में (ब्रह्म में) कलन (ईक्षण) नामक प्रथम विकार का अवसर ही कहाँ है ? भाव यह है कि पूर्वकाल में स्थित दूध उत्तरकाल में दही के आकार में परिणत होता हे । दही होने पर दूध विद्यमान नहीं रहता देश-काल सम्बन्धशून्य नित्य विद्यमान ब्रह्म मेँ कलन का अवसर ही नहीं है