Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 21, Verse 14
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 21, verse 14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
अर्धशान्तो न शान्तोऽसौ समेत्यर्थतया पुनः ।
उदेत्येकपिशाचान्ते पिशाचोऽन्यो ह्यधीमतः ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोके कि योग से मन की वृत्तिका शमन होने से ही वह शान्तो जायेगा, ज्ञान की
उसके लिए क्या आवश्यकता है, इस पर कहती हे ।
जो विक्षेपरूप अंशकी शान्ति से आधा शान्त हुआ यानी पूर्णतया निवृत्त नहीं हुआ, वह शान्त
नहीं होता, क्योकि समाधि से व्युथान होने पर वह फिर मूढ पुरुष को विक्षेपार्थरूप से प्रतीत
होता है, क्योकि मूढपुरुषको एक पिशाच की निवृत्ति होने पर दूसरा पिशाच दिखाई देता है