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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 21, Verse 57

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 21, verse 57 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 57

संस्कृत श्लोक

लीलोवाच । आतिवाहिकदेहत्वप्रत्यये घनतां गते । तामवाप्नोत्ययं देहो दशामाहो विनश्यति ॥ ५७ ॥

हिन्दी अर्थ

अन्य लोगों के स्थूलदेह का नाश दिखलाई देता है, अतएव जीवन्मुक्त के शरीर का भी नाश ही संभावित है, उसके आतिवाहिक होने की संभावना नहीं है, इस आशय से लीला पूछती है । समाधि के अभ्यास से जब “हमारा शरीर आतिवाहिक (सूक्ष्म) है” यह प्रतीति दृढ हो जाती है, तब यह स्थूल देह उक्त सूक्ष्म दशा को (अतिवाहिकता को) प्राप्त होता है, अथवा विनष्ट हो जाता हे