Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 21, Verse 18
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 21, verse 18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
पूर्वं न संभवत्येव स्मरणीयमिति स्वयम् ।
पद्मजादित्वमायाति चैतन्यस्य तथास्थितेः ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
जिनका इस समय स्मरण हो रहा है, उन वस्तुओं के ब्राह्मणसृष्टि में न रहने से भी उनके
स्मरण का (संस्कार का) सम्भव नहीं है, ऐसा कहती है।
पहले स्मरणयोग्य पदार्थ थे ही नहीं । पूर्वकल्प के ब्रह्मा के शरीर आदि की वासना से युक्त
मायोपहित चैतन्य की ही तादश आकार से स्थिति होने से वही इस प्रकार के अपूर्व ब्रह्मा आदि
के रूप से विवर्त को प्राप्त होता है