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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 21, Verses 49–50

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 21, verses 49–50 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 49,50

संस्कृत श्लोक

श्रीदेव्युवाच । संकल्पव्योमवृक्षस्ते यथा सन्नपि खात्मकः । न कुड्यात्मा न कुड्येन रोध्यते नापि कुड्यहा ॥ ४९ ॥ शुद्धैकसत्त्वनिर्माणं चिद्रूपस्यैव तत्किल । प्रतिभानमतस्तस्मात्परस्म्वाद्भिद्यते मनाक् ॥ ५० ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीदेवीजी ने कहा : भद्रे, जैसे तुम्हारा संकल्पमय आकाशवृक्ष सांकल्पिक सत्ता से सत्‌ होता हुआ भी वास्तविक सत्ता से शून्यात्मक ही है, न वह आवरण करनेवाली भीत आदि की नाई मूर्तिमान्‌ है, न वह आवरण से रोका जा सकता है और न आवरणभूत दीवार का भेदक है, क्योकि शून्यस्वरूप जो ठहरा । शुद्ध सत्त्वगुण का कार्य हमारा शरीर आदि चिद्रूप का ही वैसा (शरीराकार) प्रतिभान है, इस कारण परब्रह्म से तनिक ही उसमें भेद हे । जैसे जले हुए वस्त्र में वरत्राकार वस्तुतः उसकी भस्म ही है वैसे ही अस्मद्देहाकार वस्तुतः ब्रह्म ही है, यह भाव है