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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 21, Verse 44

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 21, verse 44 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 44

संस्कृत श्लोक

तस्मादेनं परित्यज्य देहं चिद्व्योमरूपिणी । यत्पश्यसि तदेवाद्य कुरु कार्यविदांवरे ॥ ४४ ॥

हिन्दी अर्थ

इस देह से उसकी जो प्राप्ति नहीं होती, उसमें हेतु है, उसका संकल्पजन्य होना इस बात को कैमुतिकन्याय से दढ करती हैं। जब अपने संकल्प से (मनोरथ से) निर्मित नगर अपने शरीर से प्राप्त नहीं हो सकता, तब दूसरे के संकल्प से विरचित नगर को अन्य देह केसे प्राप्त करेगी ? यानी यह संभव नहीं है॥ ४ ३॥ हे कार्यज्ञों मेँ श्रेष्ठ सुन्दरी, इसलिए इस देह का परित्याग कर तुम चिद्व्योमरूपिणी हो जाओ | चिद्व्योमरूपिणी होकर तुम तुरन्त उसको देखोगी, अतएव तुम शीघ्र वही कार्य करो