Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 21, Verses 70–72
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 21, verses 70–72 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 70-72
संस्कृत श्लोक
श्रीदेव्युवाच ।
अविचारेण तरले भ्रान्तासि चिरमाकुला ।
अविचारः स्वभावोत्थः स विचाराद्विनश्यति ॥ ७० ॥
अविचारो विचारेण निमेषादेव नश्यति ।
एषा सत्तैव तेनान्तरविद्यैषा न विद्यते ॥ ७१ ॥
तस्मान्नैवाविचारोऽस्ति नाविद्यास्ति न बन्धनम् ।
न मोक्षोऽस्ति निराबाधं शुद्धबोधमिदं जगत् ॥ ७२ ॥
हिन्दी अर्थ
विचार से बाध्य होने के कारण विचार विरोधी अविचार शब्द से वाच्य मोह ने ही उक्त भ्रम
में लोगों को डाल रक्खा है, यों देवी उसका समाधान करती है ।
श्रीदेवीजी ने कहा : चंचले, तुम अविचार से व्याकुल होकर चिरकाल से भ्रान्त हो।
अविचार स्वभाव से उत्पन्न है, विचार से उसका विनाश होता है । विचार से अविचार
पलकभर में ही निवृत्त हो जाता है । यह (अविचाररूप) अविद्या विचार से बाधित होकर
ब्रह्मसत्ता हो जाती है, इसलिए अविद्या का अस्तित्व नहीं है इसलिए न तो अविचार हे,
न अविद्या है, न बन्धन है ओर बन्धन न होने से न मोक्ष ही है, इसलिए यह जगत् केवल
अबाधित शुद्ध बोध ही है