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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 21, Verses 47–48

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 21, verses 47–48 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 47,48

संस्कृत श्लोक

लीलोवाच । त्वयोक्तं देवि गच्छावो ब्राह्मणब्राह्मणी जगत् । सहेतीदमिदं वच्मि कथं गन्तव्यमम्ब हे ॥ ४७ ॥ इमं देहमिहास्थाप्य शुद्धसत्त्वानुपातिना । चेतसा तं परं यामि लोकं त्वं कथमेषि तत् ॥ ४८ ॥

हिन्दी अर्थ

लीला ने कहा : हे देवि आपने कहा है कि ब्राह्मण ओर ब्राह्मणी के जगत्‌ में तुम और हम साथ ही जाते हैं, पर माता, मैं पृषती हूँ कि हम लोग साथ-साथ कैसे जायेंगे । इस शरीर को यहाँ पर रखकर शुद्ध सत्त्व का अनुसरण करनेवाले चित्त से मैं उस आकाशमय सृष्टि में जाऊँगी, पर आप अपनी इस देह से वहाँ कैसे जाओगी ?