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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 21, Verse 11

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 21, verse 11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 11

संस्कृत श्लोक

अत्यन्तविस्मृतं विश्वं मोक्ष इत्यभिधीयते । ईप्सितानीप्सिते तत्र न स्तः काचन कस्यचित् ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

वासनाओं की राशि ही चित्त है, चूँकि संसार वासनाराशिरूप चित्तमय है, अतः चित्तके विनाश से आत्यन्तिक निर्वासनारूप विस्मृति ही मोक्ष है, यह सिद्ध हुआ, ऐसा कहती है । विश्व का आत्यन्तिक विस्मरण मोक्ष कहलाता हे मोक्ष में किसी को भी प्रिय और अप्रिय कुछ नहीं होते, क्योंकि "अशरीरं वाव सन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशतः“ (मुक्त पुरुष को प्रिय और अप्रिय स्पर्श नहीं करते) ऐसी श्रुति है