Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 21, Verses 25–27
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 21, verses 25–27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 25,26
संस्कृत श्लोक
लीलोवाच ।
अहो नु परमा दृष्टिर्दर्शिता देवि मे त्वया ।
रूपश्रीर्जागती प्रातः प्रभयेवेक्षणद्युतिः ॥ २५ ॥
इदानीमहमेतस्यां यावत्परिणता दृशि ।
नाभ्यासेन विना तावद्भिन्धीदं देवि कौतुकम् ॥ २६ ॥
यत्रासौ ब्राह्मणो गेहे ब्राह्मण्या सहितोऽभवत् ।
तं सर्गं तं गिरिग्रामं नय मां तं विलोकये ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
प्रत्यग्- दृष्टि से प्रबुद्ध हुई लीला ने कहा ।
लीला ने कहा : हे देवी, जैसे प्रातःकाल की प्रभा लोगों को जगत् की स्फुटरूप शोभा
दिखलाती है, वैसे ही आपने मुझे बड़ी श्रेष्ठ दृष्टि दिखलाई है । इस समय जब तक मैं अभ्यास
न होने के कारण इस दृष्टि में व्युत्पत्ति प्राप्त न कर लूँ, तबतक आप मेरी इस उत्कण्ठा को
नष्ट कीजिये