Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 21, Verses 12–13
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 21, verses 12–13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 12,13
संस्कृत श्लोक
अत्यन्ताभावसंपत्तिं विनाहन्ताजगत्स्थितेः ।
अनुत्पादमयी ह्येषा नोदेत्येव विमुक्तता ॥ १२ ॥
रज्ज्वां सर्पभ्रमः सर्पशब्दार्थासंभवं स्थितम् ।
अनुत्पादमयं त्यक्त्वा शान्तोऽपि हि न शाम्यति ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
अहन्ता ओर जगत् की मूलभूत अविद्या के बाध
के विना यह अनुत्पादमयी (नित्य) विमुक्तता उदित ही नहीं होती । कभी उत्पन्न हुए ओर
रज्जू रूप से स्थित सर्पशब्द ओर सर्परूप अर्थ के भाव को जाने बिना रज्जू में सर्प का भ्रम
शान्त होने पर भी शान्त नहीं होता । भाव यह है कि रज्जू में जो सर्प भ्रम होता है, उसकी
आत्यन्तिक निवृत्ति तभी हो सकती है, जब कि सर्प शब्द और सर्परूप अर्थ का होने पर भी
फिर वह उदित हो जाता है, आत्यन्तिक निवृत्ति ही उसका एकमात्र उपाय है