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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 21, Verses 1–2

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 21, verses 1–2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 1,2

संस्कृत श्लोक

श्रीदेव्युवाच । प्रतिभान्ति जगन्त्याशु मृतिमोहादनन्तरम् । जीवस्योन्मीलनादक्ष्णो रूपाणीवाखिलान्यलम् ॥ १ ॥ दिक्कालकलनाकाशधर्मकर्ममयानि च । परिस्फुरन्त्यनन्तानि कल्पान्तस्थैर्यवन्ति च ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीदेवीजी विशेषरूप से प्रतिपादन करने के लिए पूर्वोक्त अर्थ का ही विस्तार करती है । श्रीदेवीजी ने कहा : जैसे नेत्र खोलने से सम्पूर्ण रूपों की प्रतीति होती है, वैसे ही मृत्युरूप मोह के अनन्तर जीव को शीघ्र सम्पूर्ण जगतों का पूर्णरूप से भान होने लगता हे । देश-काल-सम्बन्धमय, आकाशमय (गन्धर्वनगर आदि), धर्ममय (स्वर्ग आदि), कर्ममय (घर आदि) और प्रलयपर्यन्त स्थिर रहनेवाले पृथिवी आदि अनन्त जगत्‌ उसके सन्मुख आविर्भूत होते हैं

सर्ग सन्दर्भ

बीसवाँ सर्ग समाप्त इक्कीसवाँ सर्ग विचार॒पूर्वक देखा जाय तो स्थूल सूक्ष्म है, सूक्ष्म अविद्या है ओर अविद्या भी चिन्मात्र ही है, यों देवी द्वारा लीला का प्रतिबोधन ।