Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 21, Verses 32–34
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 21, verses 32–34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 32-34
संस्कृत श्लोक
श्रीदेव्युवाच ।
जगन्तीमान्यमूर्तानि मूर्तिमन्ति मुधाग्रहात् ।
भवद्भिरवबुद्धानि हेमानीवोर्मिकाधिया ॥ ३२ ॥
हेम्न्यूर्मिकारूपधरेऽप्यूर्मिकात्वं न विद्यते ।
यथा तथा जगद्रूपे जगन्नास्ति च ब्रह्मणि ॥ ३३ ॥
जगदाकाशमेवेदं ब्रह्मैवेह तु दृश्यते ।
दृश्यते काचिदप्यत्र धूलिरम्बुनिधाविव ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीदेवीजी ने कहा : वत्से,
ये जगत् मायामय होने के कारण अमूर्त हैं, लेकिन मिथ्याज्ञान से आप लोग इन्हें मूर्तिमान्
मान बैठे हैं जैसे कि सुवर्ण को लोग अँगूठी समझ लेते हैं जैसे अँगूठी का आकार धारण किये
हुए सुवर्ण में अँगूठीपना नहीं है वैसे ही जगत् का रूप धारण किये हुए ब्रह्म में भी जगत् नहीं
है । यह जगत् आकाश (शून्य) ही है, यहाँ पर जो कुछ दिखलाई देता है, वह ब्रह्म ही है,
जैसे धूलि के विरोधी समुद्र में प्रतिबिम्बरूप धूलि दिखलाई देती है वैसे ही ब्रह्म में भ्रमवश
माया दिखाई देती है