Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 21, Verses 54–55
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 21, verses 54–55 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 54,55
संस्कृत श्लोक
आतिवाहिक एवायं त्वादृशैश्चित्तदेहकः ।
आधिभौतिकताबुद्ध्या गृहीतश्चिरभावनात् ॥ ५४ ॥
यथा स्वप्ने यथा दीर्घकालध्याने यथा भ्रमे ।
यथा च सति संकल्पे यथा गन्धर्वपत्तने ॥ ५५ ॥
हिन्दी अर्थ
तब तो मेरा शरीर भी वस्तुतः मनोमात्र होने से आपके शरीर का सजातीय ही ठहरा,
इसलिए आपके शरीर से अभिन्न होकर या आपके शरीर से संयुक्त होकर वहाँ क्यो नहीं जा
सकता है ? इस पर कहती हैं।
पृथिवी का विकार पार्थिव कहलाता है, पार्थिवत्व से जो जाना जाय वह पार्थिवत्वसंवित्
है, यानी तुम्हारा शरीर वह अपार्थिव संवित् यानी उससे विरुद्ध चिन्मात्र स्वरूप मेरे शरीर से
कदापि अभेद या संयोग को प्राप्त नहीं हो सकता | क्या काल्पनिक पर्वत और सत्य पर्वत का
परस्पर आघात (टकराना) कहीं हो सकता है ? कहीं नहीं ॥५ ३॥
मेरा शरीर भी तो मानस ही है, इसके मानस होने से यह पार्थिव कैसे 2 इस पर कहती हैं ।
तुम्हारा यह चित्तमय शरीर आतिवाहिक ही है। जैसे स्वप्न में, दीर्घकालिक ध्यान में, भ्रम
से संकल्प होने पर और गन्धर्वनगर में आतिवाहक चित्तमय पदार्थ आधिभौतिकरूप से प्रतीत
होता है, वैसे ही तुम्हारे सरीखे लोग आतिवाहक चित्तमय देह को चिरकाल के अभ्यास से
आधिभौतिक समझ बैठे हैं