Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 21, Verse 23
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 21, verse 23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
महाचिद्रूपमेव त्वं स्मरणं विद्धि वेदनम् ।
कार्यकारणता तेन स शब्दो न च वास्तवः ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
युक्ति से ऐसा भले ही हो, पर यह बात अनुभव में कैसे आरूढ हो सकती है, उसके लिए
श्रीदेवीजी प्रत्यगृदब्टि का व्युत्पादन करती हैं ।
“स्म्यतिऽनेन इति स्मरणम्“ इस व्युत्पत्ति से स्मरण चित्संवलित व्यष्टि ओर समष्टि
अन्तःकरण है, उसीको आप वेदन जानिये और वह मायाशबल ईश्वर का कार्य हे । वहाँ पर
मायोपाधि और अन्तःकरणोपाधिका भेद प्रतीत होने पर उससे उपहित अधिष्ठानरूप सन्मात्र
मे भी भेदकल्पना होने से कार्य के अस्तित्व का जन्म कारणसत्ता के अधीन है, इस भम से पूर्व
अवस्थावाले सद्रूप कारण को यह उत्तरावस्थावाला कार्य है, ऐसा जो तुम जानती हो, वैसा
जानना ठीक नहीं है, किन्तु माया ओर उसके कार्य की उपेक्षा कर उन दोनो मे अनुगत सन्मात्र
महाचिद्रूप का ही स्मरण (वेदन) जानो । उस पूर्वोक्त लक्षणवाले प्रत्यगूदर्न से कार्यकारणता
तो बाधित हो गई, बच गया केवल कार्य ओर कारण शब्द । वह भी इस दृष्टि से देखने पर वास्तव
नहीं है । इस प्रत्यगद्रष्टि का स्वराज्यसिद्धि में खूब स्पष्टरूप से उपपादन किया गया है ।
पिण्डावस्थाघटत्वे मनच्नि कलयतो हेतुकार्यत्वधीः स्यात्
सन्मात्रं यद्वदेकं स्फुटमभिमृशतो नैव हेतुर्न कार्यम् ।
तद्वन्मायिग्रपंचौ अदिति कलयतो ब्रह्म विश्वस्य हेतुः
सन्मात्रं त्वेकरूपं प्ट परिमृशतो नैव मायी न विश्वम् ॥
(जैसे मन में मिट्टी का पिंड और घटत्व का ग्रहण (ध्यान) कर रहे पुरुष की हेतुत्व और
कार्यत्व बुद्धि होती है, केवल मिड्ठी का पिंड का ही ध्यान कर रहे पुरुष की दृष्टि में न कार्य है
और न कारण है, वैसे ही मायावान् और प्रपंच का ध्यान कर रहे पुरुष की दृष्टि में ब्रह्म विश्व
का हेतु है, यह प्रतीति होती है, एकरूप सन्मात्र का ध्यान कर रहे पुरुष की दृष्टि में मायावान्
है और न विश्व ही है।
वार्तिक में भी कहा है :
तस्मात्संभावनामात्रः संसार: प्रत्यगात्मनि ।
उक्तेऽर्थे संशयश्चेत् स्यात् प्रत्यगृद्ृष्टया निरीक्ष्यताम् ॥
इसलिए संसार प्रत्यगात्मा में संभावनामात्र है । उक्त अर्थ के विषय में यदि सन्देहहो तो
प्रत्यक् -दुष्टि से देखिये