Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 21, Verse 17
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 21, verse 17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
श्रीदेव्युवाच ।
पितामहस्मृतिस्तत्र कारणं तस्य न स्मृतिः ।
पूर्वं न संभवत्येव मुक्तत्वात्पूर्वजन्मनः ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीदेवीजी ने कहा : भद्रे, केवल संस्कार ही वासना
नहीं है, आगे मैं संस्कार से अतिरिक्त (अनादि अविद्याशक्तिरूप) वासना भी तुमसे कहूँगी।
यदि संस्कार को भी तुम सृष्टि में आवश्यक मानती हो, तो सर्वज्ञ ब्रह्मा को भावी वस्तुओं का
भी अनुभव हो सकता है, अतः उन्हीं का संस्कार उक्त सर्ग का कारण है, ऐसा मान लो ।
अपनी देह की सृष्टि आदि में तो उनका भी संस्कार कारण नहीं हो सकता हे । यदि कहो कि
उनसे पूर्व जो ब्रह्मा रहे, उनका संस्कार उनकी देह की सृष्टि में कारण है, वह भी ठीक नहीं है,
क्योंकि वे तो पूर्वकल्प की समाप्ति में ही मुक्त हो चुके