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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 81

अस्सीवाँ सर्ग समाप्त ड्क्यासीवाँ सर्ग॑ प्रलयकाल में नृत्य कर रहे भयंकर रुद्र तथा जगदरपी अंगवाली उसकी छाया कालरात्रि का वर्णन ।

95 verse-groups

  1. Verses 1–6किमकरोक्‌^ छाया5उस्िद्रद का युन“ इन प्रश्नो का उत्तर देने के लिए उपक्रम बोधते है/ महाराज…
  2. Verse 7यह मैं जब विचार कर रहा था कि इतने में तत्क्षण ही वह उस समय नाच करती हुई भगवान्‌ रुद्र के…
  3. Verse 8उसके रूप का वर्णन करते हैं / वह रंग में काली थी, पतली थी, उसके सारे अंगों में नस ही नस दी…
  4. Verse 9घनीभूत अंजन रूप तम के समान उसका श्याम वर्ण था, इसलिए देखने में वह दूसरी मूर्तिमती रात-जैस…
  5. Verse 10वह बहुत लम्बी थी, उसका मुख बड़ा ही भयानक था । वह ऐसी खडी थी, मानों अपनी लम्बी देह से आकाश…
  6. Verse 11उसे देखने से यही प्रतीति हो रही थी, मानों बहुत दिनों तक अधिक उपवास करने से ही यह ऐसी दुबल…
  7. Verse 12उसे देखने से ऐसा भान हो रहा था कि अत्यन्त लम्बी ओर दुबली उसे खडी होने में भी जब विधाता ने…
  8. Verse 13हे श्रीरामचन्द्रजी, वह इतनी अधिक लम्बी थी कि हजारों वर्षो तक ऊपर-नीचे आ-जाकर भने योगबल से…
  9. Verse 14नाड़ियों के समूहों तथा अँतड़ियों रूपी रस्सियों से ग्रथित सिर से लेकर पैर तक सभी अंगों से…
  10. Verse 15नाना वर्णो के सूर्य आदि देव तथा दानवं के मस्तकरूपी कमलो के समूहों की माला उसके कण्ठ में व…
  11. Verse 16उसके लम्बे दोनों कानों में चंचल नाग झूल रहे थे तथा दो मृतक कुण्डल के रूप में विराजमान थे…
  12. Verse 17उसका खट्वांगमण्डल मयूरो के पिच्छसमूहों तथा ब्रह्मा के केशों के मण्डलो से लांछित (चिह्नित)…
  13. Verse 18चूँकि दन्तरूपी चनद्रमाला से वह विमल थी, इसलिए विमल दाँतों के प्रकाशो के पतन से अभिवृद्ध त…
  14. Verse 19आकाश में उत्पन्न हुए वृक्ष के ऊपर आरूढ शुष्क-लता-जैसी वह ऊँचे आकाशरूपी वृक्ष के ऊपर आरूढ…
  15. Verse 20महातरंगरूपी लम्बी भुजाओंवाली, श्यामल तथा उल्लासो से परिपूर्ण, नृत्यरूपी आवर्तो से चंचल प्…
  16. Verse 21क्षण मेँ ही कभी तो वह एक भुजा से युक्त आकारवाली हो जाती थी ओर कभी क्षण में ही अनेक भुजाओं…
  17. Verse 22क्षणभर में ही तुरंत उसका आकार एक मुखवाला हो जाता था तथा शीघ्र ही उसकी आकृति अनेक मुखो से…
  18. Verse 23वह शीघ्र एक पैर से युक्त हो जाती थी तथा शीघ्र ही उसके सैकड़ों पैर हो जाते थे । क्षणभर भी…
  19. Verse 24वह रूप देखकर मैंने उसकी देह का अनुमान कर लिया कि हो न हो यह वही कालरात्रि है। अन्य सज्जन…
  20. Verse 25फिर उसके युख से लेकर पैर तक के प्रत्येक अंग का वर्णन करना प्रारम्भ करते हैं। हे श्रीरामचन…
  21. Verse 26उसके दोनों जबड़े तो लोकालोक पर्वत के प्रसिद्ध इन्द्रनील के उग्र गड्ढे की तरह ही भयंकर दीख…
  22. Verse 27इन्द्रनील पर्वत के तुल्य ऊँचे नगर के बाहर के दरवाजे पर पद्मराग आदि की प्रभा से रंजित दरवा…
  23. Verse 28नाच रही भुजलतारूपी पुष्पों से युक्त नखों की शुभ्र प्रभारूपी मेच-मण्डलों से वह आकाशतल में…
  24. Verse 29कल्पान्त मेघो (८) के तुल्य गजमुक्ताओं तथा प्रलयकाल में गिर रही तारों की श्रेणी-जैसी भासमा…
  25. Verse 30रंग में बिलकुल काले अतएव उग्र स्वरूप के अपने उन भ्रान्तभुज -वृक्षों से, जो नखोंरूपी पुष्प…
  26. Verse 31वह भगवती काली सभी ओर चलित हुए अपने जंघासमूह से, जले (०) अर्थात्‌ स्फुरित हो रही प्रभाओं स…
  27. Verse 32अनन्त महाकाश में भी पारंगत अपने केशों से वह संचरणशील अन्धकाररूपी हाथी का आकाश में विस्तृत…
  28. Verses 33–34प्रतिध्वनियों से घनीभूत दिग्मण्डल वाले गगनरूपी गाँव में उद्घोषणशील अपने उस निःश्वास पवन क…
  29. Verse 35इसके बाद मैंने आकाश में स्थित अनन्त आकाश के सदृश व्यापकरूप उस भगवती को योगबल से देखा कि व…
  30. Verse 36इतने ही में मैं क्या देखता हूँ कि एकमात्र विलासपूर्वक नृत्य करना ही जिसका अभिप्रेत अर्थ थ…
  31. Verse 37अधिक क्या कहा जाय, सारा स्रँस़ार ही उसके आभूषण आदि सामग्री के रूपमे परिणत हो गया, इस आशय…
  32. Verse 38हिमालय तथा सुमेरु पर्वत उसके दोनों कान की चाँदी और सोने की मुद्रिका ({)) बनकर शोभा बढा रह…
  33. Verse 39शिखरो, वनों एवं नगरों के गुच्छकों से परिपूर्ण तथा जीर्ण-शीर्ण गाँव, वन, द्वीप, ग्राम आदि…
  34. Verse 40हे श्रीरामचन्द्रजी, उस भगवती काली के अंगो में नगर, ग्राम, ऋतु, मास, दिन-रात तथा तीनों लोक…
  35. Verse 41भद्र, यमुना, त्रिपथगा-भागीरथी आदि नदियाँ गले के मोती आदि के हार के रूप में थीं, धर्म एवं…
  36. Verse 42भद्र, उस कालरात्रि के धर्मरूपी दूध का क्षरण करनेवाले चारों वेद चार स्तन थे, समस्त शास्त्र…
  37. Verse 43त्रिशूल, पट्टिश (पटा), (५) एक तरह का आभूषण (पनवां) । (4) अर्थात्‌ देखने योग्य नमूनेदार अल…
  38. Verse 44जो देवता आदि चौदह तरह की भूतजातियाँ हैं, वे शरीरधारी उस कालरात्रि के रोमपंक्तियों के रूप…
  39. Verse 45उसकी देह में अव्यक्तरूप से स्थित नगर, ग्राम, पर्वत आदि मानों अपना पुनर्जन्म पाने के आनन्द…
  40. Verse 46भद्र, सारा संसार उसके नर्तन में कोप रहा था, इसलिए कोई भी पदार्थ स्थावर (स्थिर) तो था ही न…
  41. Verse 47निगीर्णं जगत्‌ को उदरस्थ करके अत्यन्त तृप्ति को प्राप्त हुई वह कालरात्रि मत्त होकर चारों…
  42. Verse 48समस्त जगत्‌ विस्तीर्णं -स्वरूपवाले उसके शरीर में दर्पण-प्रतिबिम्ब में स्थित- सा मालूम पड़…
  43. Verse 49किसी समय वह नृत्य से विरत भी हो जाती थी, फिर भी उसके भीतर का जगत्‌ तो नृत्य करता-त्रा ही…
  44. Verse 50उक्त सुन्दर जगत्‌ का नृत्य उसी के देहरूपी दर्पण मेँ स्थित था और उस समय ने वीर्घकालतक उसे…
  45. Verse 51उसी जयत्‌ के नृत्य का वर्णन करते हैं / वह नृत्य क्या था, उससे समस्त तारागण चल रहे थे, सार…
  46. Verse 52संगमभूमि में छोड़े गए चक्रों के भ्रमण के सदृश शोभ रहे द्वीपों एवं समुद्रों से सारा आकाशमण…
  47. Verse 53उस नर्तन में ऊपर नीलमेघरूपी वस्त्रो का परिचालन होने पर वायुओं से आकाशमण्डल घुंघुम ध्वनि स…
  48. Verse 54परस्पर संयोग और विभाग से प्रत्येक क्षण में कभी मिलित एवं कभी विभक्त हुए जगत्पदार्थों से य…
  49. Verse 55उती जगत के नृत्य का विभागशः वर्णन करते हैं / कहीं मेरु पर्वत अपने चंचल कुलाचलरूपी बड़े-बड…
  50. Verse 56समुद्र भी अपनी मर्यादा का मुद्रण न छोड़कर नाच रहे थे और वृक्ष पृथ्वी से कभी आकाश में तथा…
  51. Verse 57किसी समय घर, अट्टालिका एवं गृहस्थी के सामान के साथ नगर घरघर ध्वनि करते हुए नीचे की ओर लुढ…
  52. Verse 58हे श्रीरामचन्द्रजी, जब भगवती कालरात्रि चतुरतापूर्ण नृत्य कर रही थी, तब चन्द्र सूर्य, दिवस…
  53. Verse 59भद्र, कालरात्रि ने नीहार के तो हार पहिने थे, उसके वस्त्र नीले मेघ थे, इसलिए मेघो से बरसाय…
  54. Verse 60अब सारा जग्रत्‌ उत भगवती का अग्रसमूह् बन गया था, यह वर्णन करते हैं / आकाश ही उसका बड़ा के…
  55. Verse 61उस भगवती की जो आँतों से युक्त वलियाँ थीं, वे द्वीप और समुद्र ही थे, जो पसलियाँ थी, वे सार…
  56. Verse 62जब भगवती कालरात्रि नृत्य करती थी, तब उसके विशाल शरीर के ऊपर हिमालय, मेरु, सहाद्रि आदि पर्…
  57. Verse 63उड़ रही पर्वतरूपी मंजरियों से युक्त पूर्ववर्णित ब्रह्माण्डमाला का इधर-उधर परिवर्तन करती ह…
  58. Verse 64हे श्रीरामजी, वे सुर, असुर, नाग आदि के समूह ही भगवती के रोम थे, इसका शरीर स्पन्दनरहित होक…
  59. Verse 65भद्र, कर्मफलरूप नाना वैभव, कर्मानुष्ठान के कारण अनेक विज्ञान एवं अनुष्ठान यज्ञ -इन तीन सू…
  60. Verse 66वस्तुतः उस नृत्य में कुछ भी नहीं हिल रहा था परन्तु भूतल और आकाश चक्र के चमकने से एक के एक…
  61. Verse 67कालरात्रि की श्वासवायुओं का वर्णन करते हैं / उस भगवती के बड़े-बड़े नासिकागुहारूपी घरों से…
  62. Verse 68भद्र, सारा आकाशमण्डल उस भगवती के चातुर्यपूर्णं पद्धति से संचालित हुए सैकड़ों हाथों के कार…
  63. Verse 69उसके अंगों से जनित जगत्पदार्थो के साथ-साथ जो भ्रमण हुए, उनसे उत्पन्न श्रम के कारण मेरी धी…
  64. Verse 70उसका देहरूपी दर्पण जब कुछ भ्रमणशील हो गया, तब यन्त्रोके सदृश पर्वत विचलित होने लगे, आकाशच…
  65. Verse 71उसकी नाभि में पृथ्वी की कोमलता के सदृश उस समय शोभा मालूम हो रही थी, क्योकि अनेक मेरु पर्व…
  66. Verse 72उस भगवती की देह में अनेक सह्य पर्वत पृथ्वीपर पक्षियों के सदृश, अनेक विन्ध्याचल आकाश में व…
  67. Verse 73उसके देहरूपी सरोवर में अनेक द्वीप तृणों के सदृश, समुद्र वलयो के सदृश और देवताओं के आलय पद…
  68. Verses 74–75भगवती का शरीरांग विशद्‌ आकाश के सदृश विशाल था, स्वप्न में उत्पन्न महान अंजन पर्वत के सदृश…
  69. Verse 76श्रीरामजी, एक और आश्चर्य सुनिये - उसकी देह में पर्वत पर समुद्र नाच रहा था, वह पर्वत ऊँचे…
  70. Verse 77भद्र, आकाश में पर्वत घूम रहे थे, दिशाओं में समुद्र घूम रहे थे, पुर, नगर, मण्डल, नवियाँ, स…
  71. Verse 78मत्स्य समुद्र की नाई मरुभूमि में घूम रहे थे, नगर पृथ्वी के सदृश आकाश में स्थिर दिखाई दे र…
  72. Verse 79किसी यन्त्र-चक्र में हजारों की संख्या में दीपक लगे हों और वह यदि घूमता हो तो कितना सुन्दर…
  73. Verse 80भद्र, भगवती कालरात्रि के शरीर में प्रलय एवं सृष्टियों के समूह दिन- रात के भाग में प्रतीत…
  74. Verse 81हे राघव उसकी देह में सूर्य, चन्द्र आदि के मण्डल तो रत्न बन गये थे, नक्षत्रसमूह तरल वर्तुल…
  75. Verse 82भगवती के नृत्य कल्पान्तकाल में लुढक रहे तीनों जगत्‌ ऊपर-नीचे परिवर्तनं के कारण तत्काल ही…
  76. Verse 83भद्र, अब एक दूसरा आश्चर्य सुनिये-देवी के ताण्डवनृत्यकाल में वीरजनों का बड़ा-बड़ा कोलाहल स…
  77. Verse 84यह दूसरा आश्चर्य सुनिये-भूत, भविष्यत्‌ अनन्त कोटि सृष्टि, प्रलय आदि से युक्त इस भगवती काल…
  78. Verse 85भद्र, भगवती के शरीर में जो सर्ग दिखाई देता था, उसमें सृष्टि, प्रलय, सुखदुःख, भव-अभव, इच्छ…
  79. Verse 86भगवती के शरीर रूप चिदाकाश में मिथ्यारूप ही चमक रहे अतएव चिदाकाशरूप (शून्यरूप) सृष्टि, प्र…
  80. Verse 87भद्र, भगवती की देह में उत्पात, शान्ति, आदि परस्पर विरुद्ध द्न्द्र-समूह एकत्र ऐसे प्रतीत ह…
  81. Verse 88श्रीरामजी, परमार्थ-दशा में चिदाकाश उसकी देह में स्वभावभूत यानी अशास्त्रीय ज्ञान से सिद्ध…
  82. Verse 89भद्र, अविचल अधिष्ठानरूप स्थिति में विद्यमान जगत्‌ वस्तुतः अक्षुब्ध ही है, फिर भी मायाक्षो…
  83. Verse 90जैसे बालक के संकल्प का सर्ग प्रतिक्षण पूर्वस्थिति का त्याग कर अन्यस्थिति ग्रहण करता है, व…
  84. Verse 91सव पदार्थों का उत्पादन करने के निष कारकों की क्रियाशक्ति उपयोग में आती है. आगे के भावविका…
  85. Verse 92माया भगवती परिणामि-स्वभाव जड़ जयत्रुपा होने के कारण ही प्रतिक्षण अन्य-अन्य रूपकी प्रतीत ह…
  86. Verse 93चूँकि सर्वविध कलाओं से परिपूर्ण जगतात्मक यह देवी संवित्‌- शक्तिरूपा है, इसलिए अनन्त एवं व…
  87. Verse 94वह देवी कालरात्रि तीनों काल में स्थित तत्‌-तत्‌ विचित्र परिणामधारी समस्त त्रिजगत्‌ की भीत…
  88. Verse 95तब क्या वह देवी प्रपंचपूर्ण ही हैं, इस प्रश्न का नकारात्मक उत्तर देते हैं अविद्या से आवृत…
  89. Verse 96विवर्त एवं परिणाम की दष्ट से तथा जीवन्मुक्त एवं युक्तिवादी आत्माओं की द्वष्टि से उत माया…
  90. Verse 97यों उप्र कालरत्रि और उसके नृत्य का सात्विक स्वरूप बतलाकर अब उसके नृत्य का उतरा आदि से वर्…
  91. Verse 98भद्र, मैं क्या वर्णन करू, कल्पान्तकाल के महारुद्र के ललाट-स्थान का दृढ़तापूर्वक आश्रय कर…
  92. Verse 99उक्त देवी के गरले मे पूर्ववर्णित केवल मालावन्धन ही नहीं था, परन्तु कुदाल, यूस्ल, ओखली आदि…
  93. Verse 100हे श्रीरामजी, इस तरह के नानाविध पुष्पमालासमूहों के फूलों को, जो नृत्य में क्षुब्ध तथा भंग…
  94. Verse 101इस प्रकार भयंकर रूप धारण करनेवाली उस कालरात्रि के द्वारा वन्दित हो रहे उसी प्रकार का आकाश…
  95. Verse 102रक्त एवं आसवों से पूर्ण यमराज के महिष का महान्‌ सींग हाथ में लेकर डिब, डिब, सुडिंब, पचपच,…