Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 81, Verse 95
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 81, verse 95 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 95
संस्कृत श्लोक
सर्वात्मकैकवपुरेकचिदात्मकत्वात्संशान्तखैकवपुरेकचिदात्मतत्वात् ।
एवं निमेषणसमुन्मिषितैकरूपं सा बिभ्रती वपुरनन्तमनादि भाति ॥ ९५ ॥
हिन्दी अर्थ
तब क्या वह देवी प्रपंचपूर्ण ही हैं, इस प्रश्न का नकारात्मक उत्तर देते हैं
अविद्या से आवृत चिति-शक्ति के कारण वह देवी समस्त संसारूप एक विद्या से अविद्या के
हट जाने पर शुद्ध ज्ञानात्मक बन जाने के कारण वह शान्त आकाशरूप शरीरधारिणी होकर
सर्वविध प्रपंच से निर्मुक्त होकर स्थित हो जाती है । इस प्रकार बद्ध और मुक्त पुरुष की दृष्टि से
गम्य एवं विद्या-अविद्या से क्रमशः व्यंजित हो रहे स्वरूप से उपलक्षित तथा परमार्थ रूपसे
अनादि-अनन्त चिदेकरूप को धारण कर रही वह देवी ही प्रकाशती रहती है