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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 81, Verse 22

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 81, verse 22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 22

संस्कृत श्लोक

क्षिप्रमेकमुखाकारा क्षिप्रं बहुमुखाकृतिः । अनन्तोग्रमुखी क्षिप्रं निर्मुखी चापि च क्षणम् ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

क्षणभर में ही तुरंत उसका आकार एक मुखवाला हो जाता था तथा शीघ्र ही उसकी आकृति अनेक मुखो से युक्त बन जाती थी । शीघ्र ही वह अनन्त उग्र मुख धारण कर लेती थी तथा क्षणभर में ही बिना मुखवाली भी वह हो जाती थी