Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 81, Verse 84
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 81, verse 84 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 84
संस्कृत श्लोक
ब्रह्मेन्द्रविष्णुहरवह्निरवीन्दुपूर्वा देवासुराः परिविवृत्तिभिरापतन्तः ।
अन्येऽन्य एव विविधा उपयान्ति यान्ति वातावधूतमशकाशनिविभ्रमेण ॥ ८४ ॥
हिन्दी अर्थ
यह दूसरा आश्चर्य सुनिये-भूत, भविष्यत् अनन्त कोटि
सृष्टि, प्रलय आदि से युक्त इस भगवती कालरात्रि का जब ताण्डव होता था, तब ब्रह्मा, इन्द्र आदि
देवता एवं असुर अपनी-अपनी अधिकार प्रवृत्ति से दूसरे-दूसरे बनकर वायु से चालित मच्छरों के
सदश या बिजली के सदृश प्रसिद्ध अस्थिरताविलास से आते और जाते दीख पड़ते थे