Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 81, Verse 65
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 81, verse 65 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 65
संस्कृत श्लोक
नानाविभवविज्ञानयज्ञयज्ञोपवीतिनी ।
सा सरन्ती नभस्यासीद्धनघूत्कारघोषिणी ॥ ६५ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र,
कर्मफलरूप नाना वैभव, कर्मानुष्ठान के कारण अनेक विज्ञान एवं अनुष्ठान यज्ञ -इन तीन
सूत्रों का उसने यज्ञोपवीत धारण किया तथा, आकाश में नाचती हुई वह मेघो की ध्वनियोँ को
लेकर वेदघोष कर रही थी, इसलिये ठीक ब्रह्मचारिणी की तरह प्रतीत हो रही थी