Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 81, Verse 47
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 81, verse 47 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 47
संस्कृत श्लोक
निगीर्णं जगदङ्गस्थं कृत्वा तृप्तिमुपागता ।
परिनृत्यति सा मत्ता जगज्जीर्णाहि चातकी ॥ ४७ ॥
हिन्दी अर्थ
निगीर्णं जगत् को उदरस्थ करके अत्यन्त तृप्ति को प्राप्त हुई वह कालरात्रि मत्त होकर चारों ओर
नृत्य कर रही थी, वह जगत्रूपी सर्प को जीर्णं बनाने ओर नचाने के कारण ठीक मयूरी-सी मालुम
हो रही थी