Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 81, Verse 83
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 81, verse 83 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 83
संस्कृत श्लोक
संग्राममत्तभटखङ्गमरीचिवीचि श्यामायमानसकलातपवासराणाम् ।
व्यावृत्तिभिर्विलुठतामपि सुस्थिराणामाकर्ण्यते कलकलो जनमण्डलानाम् ॥ ८३ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, अब एक दूसरा आश्चर्य सुनिये-देवी के ताण्डवनृत्यकाल में वीरजनों
का बड़ा-बड़ा कोलाहल सुनाई दे रहा था, ये वीरजन संग्राम में मत्त शत्रु योद्धाओं के लिए निकाले
गए खड्गो की मरीचियों की प्रभा से ग्रीष्मकाल के दिनों को भी मलिन कर रहे थे । देवी के नृत्य के
समय ऊपर-नीचे होने वाले संचालनों से वे योद्धा लुढ़क रहे थे, फिर भी अधिष्ठानभूत ब्रह्म की
स्थिरता के कारण वे स्थिर थे