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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 81, Verse 23

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 81, verse 23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 23

संस्कृत श्लोक

एकपादान्विता क्षिप्रं क्षिप्रं पादशतान्विता । क्षणं चानन्तपादाढ्या निष्पादाकारिणी क्षणम् ॥ २३ ॥

हिन्दी अर्थ

वह शीघ्र एक पैर से युक्त हो जाती थी तथा शीघ्र ही उसके सैकड़ों पैर हो जाते थे । क्षणभर भी देर न हो पाती थी कि इतने ही में वह अनन्त पैरों से समन्वित हो जाती थी तथा क्षण में ही वह बिना पैर की भी हो जाती थी