Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 81, Verse 58
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 81, verse 58 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 58
संस्कृत श्लोक
तस्यां भ्रमन्त्यां चतुरं चन्द्रार्कदिनरात्रयः ।
नखाग्रलेखालोकान्तर्भ्रान्तिकाञ्चनसूत्रवत् ॥ ५८ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामचन्द्रजी, जब
भगवती कालरात्रि चतुरतापूर्ण नृत्य कर रही थी, तब चन्द्र सूर्य, दिवस ओर रात उसके नखाग्रभाग
की रेखाओं के अन्दर विद्यमान आलोक में (प्रभा मेँ) मिलकर घूमते हुए, सुवर्णसूत्र के सदृश,
दीर्घाकार प्रकाशित हो रहे थे