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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 81, Verse 86

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 81, verse 86 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 86

संस्कृत श्लोक

भावोद्भवस्थितिविपत्करणभ्रमाणां संहारसर्गभुवनावनिविभ्रमाणाम् । मिथ्यैव खे प्रकचतां खशरीरकाणां संलक्ष्यतेऽत्र न मनागपि नाम संख्या ॥ ८६ ॥

हिन्दी अर्थ

भगवती के शरीर रूप चिदाकाश में मिथ्यारूप ही चमक रहे अतएव चिदाकाशरूप (शून्यरूप) सृष्टि, प्रलय, चतुर्दश भुवन, पृथ्वी आदि पदार्थो की अधिष्ठानवश हुई उत्पत्ति, स्थिति, विनाश, अर्थक्रिया, परिश्रम- इन सबकी संख्या कितनी थी, यह तनिक भी मालुम नहीं हो सकती थी