Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 81, Verses 33–34
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 81, verses 33–34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 33,34
संस्कृत श्लोक
उह्यन्ते मेरवो येन तेन निश्वासवायुना ।
घनघुंघुमदिक्चक्रगगनग्रामघोषिणा ॥ ३३ ॥
घनमारुतफूत्कारक्ष्वेडगेयं प्रगायता ।
नियतानुनयेनेव चलिता सानुवृत्तिना ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
प्रतिध्वनियों से घनीभूत दिग्मण्डल वाले गगनरूपी गाँव में उद्घोषणशील अपने
उस निःश्वास पवन के साथ, जिसके द्वारा मेरु आदि अनेक पर्वत उड़ा दिये जाते थे, वह भगवती
बराबर चली जा रही थीं । देखने से ऐसा प्रतीत हो रहा था कि वह एक ऐसे नटके साथ चली जा
रही हैं, जो नियत अनुनयवाला है, और प्रबल वायु के फूत्काररूपी अव्यक्त शब्द से परिपूर्ण गीत
गा रहा है