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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 81, Verse 37

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 81, verse 37 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 37

संस्कृत श्लोक

आसीत्तस्या युगान्ताभ्रमालिका पट्टपट्टिका । आदर्शमण्डलान्यङ्गे त्रीणि लोकान्तराणि च ॥ ३७ ॥

हिन्दी अर्थ

अधिक क्या कहा जाय, सारा स्रँस़ार ही उसके आभूषण आदि सामग्री के रूपमे परिणत हो गया, इस आशय से कहते हैं / हे श्रीरामचन्द्रजी, युगान्तकाल के प्रसिद्ध पुष्करावर्तक आदि अभ्रमालिका (मेघसमूह) उसके वक्षःस्थल में इन्द्रनील की पट्टपटिटिका के रूप में (५) विराजमान थी । तीनों लोकान्तर उसके जघन, उदर आदि अंग मेँ मणिमय आदर्शमण्डल (&) बन गये थे