Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 81, Verse 78
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 81, verse 78 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 78
संस्कृत श्लोक
मत्स्याश्चरन्ति च मरौ वरवारिणीव व्योम्नि स्थिराणि नगराणि भुवीव भान्ति ।
खे भूधरा गगनसंक्षयवारिवाहमुत्पातवातपरिवृत्तगिरिस्थितं तत् ॥ ७८ ॥
हिन्दी अर्थ
मत्स्य समुद्र की नाई मरुभूमि में घूम रहे थे, नगर पृथ्वी के सदृश आकाश में स्थिर दिखाई दे रहे
थे, पर्वत आकाश में प्रतीत हो रहे थे अधिक आश्चर्य तो यह था कि आकाश एवं प्रलय के मेघ
उत्पात-वायुओं से धिरे हुए पर्वतो पर स्थित थे