Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 81, Verse 87
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 81, verse 87 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 87
संस्कृत श्लोक
उत्पातशान्तिमरणोत्सवयुद्धसाम्यविद्वेषरागभयविश्वसनादि तत्र ।
एकत्र कोश इव रत्नचयो विभाति नानारसाप्रतिघसर्गपरम्परं तत् ॥ ८७ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, भगवती की
देह में उत्पात, शान्ति, आदि परस्पर विरुद्ध द्न्द्र-समूह एकत्र ऐसे प्रतीत होता था, जैसे एक कोश
में एकत्र रत्नों का समूह । क्योकि भगवती के शरीर में रसों से अन्योन्य अनुचित अनेक सर्गपरम्पराएँ
विद्यमान थी