Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 22
इक्कीसवाँ सर्ग समाप्त बारईसवाँ सर्ग॑ सबसे पहले अनेक युक्क्ति-प्रयुक्तियों से ज्ञानियों के लक्षणों का वर्णन तथा प्रसंग से जीव, जगत् और ब्रह्म के स्वरूप का वर्णन |
62 verse-groups
- Verse 1शिष्य ज्ञान और उसका फल पहले बतलाया यया हैं, अब ज्ञानी वव किमुच्यते -ज्ानित्वेऽपि व कि फलम…
- Verse 2जो ज्ञानी पुरुष अन्तःकरण के भोग्य विषयों में तथा उसकी चक्षु आदि द्वारा निर्गत ज्ञानात्मक…
- Verse 3स्वाभाविक एकमात्र स्वात्मलाभ से युक्त जिस पुरुष की व्यवहारो मेँ भीतर से शीतलता बुद्धिमानो…
- Verse 4पुनर्जन्म का कारण जो अनादि अज्ञान है उस्रका निवर्तक तत्वज्ञान है, दूसरा नहीं; यह कहते हैं…
- Verse 5प्रारब्ध के प्रवाह में जो भी कार्य आ जाय, उसके लिए जो मनुष्य काम और संकल्प को छोड़कर तत्प…
- Verse 6ये जो ज्ञानी के लक्षण बतलाये यये हैं उनकी युक्तिपूर्णता बतलाने के लिए तत्त्वज्ञान सम्पूर्…
- Verse 7आगे के वृद्धि आदि भावविकारों में भी कारण के न रहने से ही अस़त्त्त समझना चाहिए, इस आशय से…
- Verses 8–9इस समय दिखाई दे रहा भी बीज सद्रूप अंकुर का कारण है या असद्रूप आकर का कारण हैं 2 सद्रूप अं…
- Verse 10द्वैत का निष्कारण अस्तित्व मानने पर अनिर्मोक्ष-प्रस्नक्ति एवं मोक्षशातर मे अप्रमाण्य आ जा…
- Verse 11संसार अज्ञान का कार्य है ओर तत्वसाक्षात्कार क्षण में ही वह विनष्ट हो जाता है, इन दोनो बात…
- Verse 12उपयुक्त श्लोक के पूर्वार्ध का विवरण करते हैं / पूर्वोक्त रीति से अचेतन को यानी अहंकारादि…
- Verse 13उत्तरार्ध का भी विवरण करते हैं / (79) अथवा अचेतन यानी बुद्धि, स्थूल देह ओर चिदाभास इन तीन…
- Verse 14यही कारण है कि तत्त्ववेत्ताओं की चेष्टाएँ अभिमानरहित होने से अस्पन्दकृप ही हुआ करती हैं;…
- Verse 15जेते दग्ध पट का दर्शन पटदर्शनरूप कभी नहीं होता किन्तु भस्मदर्शनरूप ही होता हैं, वैसे ही ब…
- Verse 16द्ृश्यदर्शन के अभाव में भी जल द्ष्टान्त विये यये हैं; इस आशय से कहते हैं । हे श्रीरामजी,…
- Verse 17इम्रीलिए उन्हें कर्मबन्धन के सम्बन्ध का अभाव रहता है, यह कहते हैं / चूँकि दृश्यदर्शन के अ…
- Verse 18पारलोकिक कर्मो की अपेक्षा तो उनसे बहुत दूर ही रहती है, इस आशय से कहते हैं । जो इस संसार क…
- Verse 19अन्न पुरुषों के लिए तो एकमात्र कर्म ही शरण हैं, यह कहते हैं ।/ हे निष्पाप श्रीरामजी, जो म…
- Verse 20क्या उनके लिए एकमात्र कर्म ही शरण है, इस आशंका पर कहते हैं / अज्ञानियों की इन्द्र्यो अधःप…
- Verse 21जले हुए तथा न जले हुए पट में अक्यकसाम्य की नाई काधितअकाधित जग्रत् के अवयवसास्य का भान अज…
- Verse 22छष्टिशन्दार्थ से रहित होने में प्रलय दष्टान्त है, यह कहते हैं । जिस तरह कल्प के अन्त में…
- Verse 23प्रलय मे स्पन्दन की सत्ता नहीं है, यों असम्भावना करनेवाले के श्राति द्ष्टान्त कहते हैं ।…
- Verse 24वहाँ पर विदाभास का स्यन्दन हैं, इसमे भी द्रष्टान्त कहते हैं / जैसे तालाब आदि के भीतर स्थि…
- Verse 25निरवयव ब्रह्म मे अवयवयुक्त जयत् के सद्भाव में भी वष्टान्त देते हैं जैसे निरवयव आकाश में…
- Verse 26ङी रीति से पूर्वोक्त अहंकार और जयत्-ये दोनों एक-दूसरे के अन्दर स्थित हैं; यह समझ लेना चा…
- Verse 27अधःपतन हो ही जाता है । देखिये श्रुति क्या कहती है : कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं सम…
- Verse 28जैसे आपाततः भ्रान्ति से सुवर्णपिण्ड में भूत और भावी कटक, केयूर आदि आकार दिखाई पडते हैं, क…
- Verse 29यही कारण है कि जीवन्मुक्त तत्वज्ञानियों की जन्म-मरणादिरुप स्राँसारिक स्थितियाँ अन्य द्रष्…
- Verse 30जैसे घर के अन्दर स्थित भी पुरुष गोशाला आदि में आसक्तचित्त हो गृह कार्यों को नहीं देखता, व…
- Verse 31प्रासंगिक बातें समाप्तकर अब प्रस्तुत का अनुसन्धान कर रहे हैं / जैसे ब्रह्माण्ड के हदय में…
- Verse 32उस जीव के देहधारण का प्रकार बतलाते हैं । पिता के हृदय में वीर्यरूप से अवस्थित अहंकारात्मा…
- Verse 33इस प्रकार त्रिकोणाकारोपलक्षित माता के गर्भ में, एकमात्र शुक्र ही, जिसमें सत् यानी अस्थि,…
- Verse 34उसमें भी, चन्द्रकलाओं के वन्द्रबिम्ब की नाई हृदय में स्थित कीर्यकर्णो के भीतर अहभाव की रक…
- Verse 35उसके बाह्म पदार्थों के अवलोकन में द्वार बतलाते हैं / इन्द्रियों के छिद्ररूपी पनाले से बाह…
- Verse 36समस्त देह की अपेक्षा वीर्य में इसका विशेषाभिमान अनुभवसिद्ध है यह बतलाते हैं / यद्यपि समस्…
- Verse 37यही कारण हैं कि हार्दिक संकल्पपूर्वक ही सम्पूर्ण बाह्य पदार्थों के व्यवहार प्रवर्त होते ह…
- Verse 38॥ ओर उसी कारण से उस जीव का वह अहभाव चित्त की ब्रह्माकार स्थिति के बिना हजारों अन्य उपायों…
- Verse 39इसलिए हे श्रीरामचन्द्रजी मनन, निदिध्यासन आदि के द्वारा निरंतर चिंतन की जा रही भी अपनी ब्र…
- Verse 40तो क्या आप जैसे महानुभावों को भी वह वैसी ही सम्पादनीय हैं, इस पर नहीं यह कहते हैं / ब्रह्…
- Verse 41जिसके अंदर तुच्छ प्रपंच की भावना नहीं है, वह जीते-जी आकाश के समान विशाल, श्रृंखला आदि के…
- Verse 42शुक्रा के सम्बंध के वश से ही समस्त शरीर में अहंभाव का सम्बंध भी रहता है यह कहते हैं / वीर…
- Verse 43चक्षु आदि इन्द्रियों के रूप से तत्-तत् स्थानों में सम्कध भी शुक्रात्मशूत ही जीव का रहता…
- Verse 44अज्ञानावृत चिति की विपरीत भावना ही सबसे पहले मन बनती है, फिर वीर्य मे अहंभावरूप एक देश के…
- Verse 45इसीलिए उसके ग्रतिक्रल यथार्थ भावना के बिना उस जीव के दुःखों का उपरम नहीं होता, यह कहते है…
- Verse 46सारे सांसारिक पदार्थों में ब्रह्मरुप की भावना कर रहे पुरुष को तो बाह्य सर्वस्व का त्यागर…
- Verse 47समग्र ब्रह्माकार वासनाओं से अथवा जले हुए वस्त्रं के तन्तुओं के आकार के सदृश जागतिक समस्त…
- Verse 48षष्ठ आदि भूमिकाओं में प्रविष्ट होने के कारण आसन, शयन या यान में स्थित, निर्वाणदशा को प्रा…
- Verse 49हे श्रीरामचन्द्रजी, सर्वत्र व्याप्त भी संविन्मात्र वह पुरुष शरीर के स्फुटसार में (वीर्य म…
- Verse 50इस तरह व्यष्टि ओर समष्टि जीव-भावादि के वर्णन को परम ग्रस्तुत विषय में संयोजित करके अपने उ…
- Verse 51दढ वैराग्य होना ही साधन- रहस्य है, यह कहते हैं / हे श्रीरामजी, समस्त सांसारिक विभव आदि भा…
- Verse 52(पफाकाण के समान अयने हृदय को बना करके” यह जो ऊपर कहा है उसे और साफरूप से कह रहे हैं। हे स…
- Verse 53यही कारण हे कि स्फटिक पत्थर में प्रतिकिग्वित मनुष्यों के व्यवहार कर्मों के सदश ज्ञानी और…
- Verse 54और इस तरह स्फटिक पत्थर में द्रष्टापुरुष की दृष्टि की नाई चैतन्य की जो सत्ता है वही वासनाओ…
- Verse 55उसनिषए एकमात्र चिति की सत्ता ही नित्य है, यह कहते हैं । यह सारा दृश्य प्रपंच पहले नष्ट हो…
- Verse 56हे श्रीरामजी, इस तरह के बोध से मूलअज्ञान का नाश होने पर अन्वेषण करने पर भी कहीं जगत्भ्रा…
- Verse 57आत्मपदार्थ के साक्षात्कार से काटी गई अहंभावना दिखाई देने पर भी भीतर में संसार को इस तरह उ…
- Verse 58(८) अथवा हे साधो श्रीरामचन्द्रजी, आज तक चिदात्मा के अभिमान से शून्य होने के कारण अचित्व श…
- Verse 59मनयुक्त हठयोगी लोग शान्ति आदि गुणो के कारण अपनी आत्मा मे क्यो नहीं स्थित रहते ? इस आशंका…
- Verse 60चित्त, देह आदिरुप से जीव की जो एकरूपता है वही ब्रह्म से जीव को भिन्न बनानेवाली ओर उसको सं…
- Verse 61आत्मा के उती मूरति्चून्य केवल विदालोकस्वरूप का अनुभव कराते हैं / पुरुष के शरीर से बहुत दू…
- Verse 62निर्विष्यक चिति का ही यह जग्रत् एक माधिक चमत्कार हैं, यह कहते हैं । असीम ओर अनभिव्यक्त स…
- Verse 63भी यह संसार सर्वनियन्ता परमेश्वर की समस्त नियन्त्रण व्यवस्थाओं से तथा भोगप्रीतियों से अनु…