Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, Verse 57
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, verse 57 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 22 · श्लोक 57
संस्कृत श्लोक
यथाभूतार्थसदर्शच्छिन्नाऽहमिति भावना ।
दृष्टामि न करोत्यन्तर्दग्धं बीजमिवाङ्कुरम् ॥ ५७ ॥
हिन्दी अर्थ
आत्मपदार्थ के साक्षात्कार से काटी गई
अहंभावना दिखाई देने पर भी भीतर में संसार को इस तरह उत्पन्न नहीं कर पाती, जिस तरह
दग्ध कर दिया गया बीज अंकुर उत्पन्न नहीं कर पाता