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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, Verse 60

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, verse 60 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 22 · श्लोक 60

संस्कृत श्लोक

अघनः केवलालोको बुधो जीवः परायते । स एवान्योऽप्यनन्योऽन्तरपराह्न इवातपः ॥ ६० ॥

हिन्दी अर्थ

चित्त, देह आदिरुप से जीव की जो एकरूपता है वही ब्रह्म से जीव को भिन्न बनानेवाली ओर उसको संताप देनेवाली है ओर उसके अभाव में तो यह जीव ब्रह्म से अभिन्न एवं सतायशून्य ही बना रहता है, यह कहते हैं / जीव ज्ञानी (शोधित त्वंपदार्थ), मूर्तिशून्य, (चित्त, देह आदि स्वरूप न हुआ) एवं शुद्ध चैतन्यप्रकाशरूप बनकर ही परमात्मा के साथ एकता प्राप्त करने के लिए योग्य हो जाता है। वही जीव अन्य होता हुआ भी उस परमात्मा से ऐसे अनन्य है, जैसे मध्याहकाल में सूर्य का प्रकाश सूर्य से अनन्य है