Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, Verse 47
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, verse 47 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 22 · श्लोक 47
संस्कृत श्लोक
वासनाभिरुपेतोऽपि समग्राभिरवासनः ।
अन्तःशून्योऽप्यशून्यात्मा खमिव श्वसनान्वितः ॥ ४७ ॥
हिन्दी अर्थ
समग्र ब्रह्माकार
वासनाओं से अथवा जले हुए वस्त्रं के तन्तुओं के आकार के सदृश जागतिक समस्त वासनाओं से
युक्त हुआ भी तत्त्वज्ञानी पुरुष वासनारहित ही रहता है तथा अन्तःशून्य होता हुआ भी परिपूर्णात्मा
वह आकाश के सदृश प्राणवायु से समन्वित रहता है