Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, Verse 52
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, verse 52 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 22 · श्लोक 52
संस्कृत श्लोक
साधो हृदयसौषिर्यमसौषिर्यमिवास्तु ते ।
अचित्त्ववपुषोऽचित्त्वादुपलस्येव राघव ॥ ५२ ॥
हिन्दी अर्थ
(पफाकाण के समान अयने हृदय को बना करके” यह जो ऊपर कहा है उसे और साफरूप से
कह रहे हैं।
हे साधो, राघव, जैसे अचित्त्वशरीर पत्थर के हृदय का पोलापन अचिद्रूप होने से ही चिति के
निवेश के लिए अवकाशअभावरूप अपोलापन प्रसिद्ध है वैसे चिन्मात्रशरीर आपका दहराकाशरूप
हृदय सौर्षिय (हृदय पोलापन) चिद्रूप होने से ही अचिति के निवेश के लिए अवकाशअभावरूप
चिति से निबिडित (सघन) अपोलापन की नाई हो जाय (८)