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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, Verse 53

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, verse 53 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 22 · श्लोक 53

संस्कृत श्लोक

तज्ज्ञाज्ञयोरशेषेषु भावाभावेषु कर्मसु । ऋते निर्वासनत्वात्तु न विशेषोऽस्ति कश्चन ॥ ५३ ॥

हिन्दी अर्थ

यही कारण हे कि स्फटिक पत्थर में प्रतिकिग्वित मनुष्यों के व्यवहार कर्मों के सदश ज्ञानी और अज्ञानी दोनों में प्रतीति साम्य रहने पर भी सत्यत्व वाग्ननाभावक्ृत विशेष हैं, यह कहते हैं / हे श्रीरामजी, तत्त्वज्ञानी और अज्ञानी- दोनों के सम्पूर्ण भाव और अभाव रूप कर्मों में एकमात्र वासनाभाव के सिवा और कोई दूसरा विशेष नहीं रहता