Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, Verse 61
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, verse 61 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 22 · श्लोक 61
संस्कृत श्लोक
एकदेशस्थितात्पुंसो दूरायातस्य चेतसः ।
यद्रूपं सकलं मध्ये तद्रूपं परमात्मनः ॥ ६१ ॥
हिन्दी अर्थ
आत्मा के उती मूरति्चून्य केवल विदालोकस्वरूप का अनुभव कराते हैं /
पुरुष के शरीर से बहुत दूरी पर स्थित सूर्य, चन्द्र आदि मण्डलतक चक्षु आदि के द्वारा गये हुए
चित्त की जो वृत्ति है, उसका मध्य में विच्छेद न रहने के कारण देह से लेकर सूर्यादिमण्डल पर्यन्त
अविच्छिन्नरूप से अपरोक्ष चिति उसमें अभिव्यक्त है ही । यह वृत्ति देहप्रदेश तथा चन्द्रप्रदेश में
यद्यपि विषयसहित है, तथापि मध्यभाग मेँ उसका निर्विषयक जो रूप प्रसिद्ध है उसी रूप को
परमात्मा का पूर्ण रूप समझना चाहिए (7)