Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, Verse 37
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, verse 37 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 22 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
जीवः संकल्पमात्रात्मा यत्संकल्पोऽवतिष्ठते ।
हृदि भूत्वा स एवाशु बहिः प्रसरति स्फुटम् ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
यही कारण हैं कि हार्दिक संकल्पपूर्वक ही सम्पूर्ण बाह्य पदार्थों के व्यवहार प्रवर्त होते हैं
यह कहते हैं /
इसी हेतु से संकल्पात्मक यह जीव हृदय के अन्दर रहकर जिस किसी वस्तु का संकल्प करता
है, शीघ्र उसी रूप से बाहर स्पष्ट प्रसृत होने लग जाता है