Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, Verse 20
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, verse 20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 22 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
इन्द्रियाणि पतन्त्यर्थं भ्रष्टं गृध्र इवामिषम् ।
तानि संयम्य मनसा युक्त आसीत तत्परः ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
क्या उनके लिए एकमात्र कर्म ही शरण है, इस आशंका पर कहते हैं /
अज्ञानियों की इन्द्र्यो अधःपतन (५) के हेतुभूत अर्थो के ऊपर इस प्रकार गिरती हैं, जिस
(%ऋ) तात्पर्य यह कि सत्कर्म का अवलम्बन न रहने से अज्ञानियों का इन्द्रियों के द्वारा
प्रकार नीचे गिरे हुए मांस के ऊपर गीध गिरता है । इसलिए हे श्रीरामजी, विद्वान् को चाहिए
कि वह अपनी उन सभी इन्द्रियों का मन से निग्रह करके आत्मज्ञान के समापन में लग जाय
और उसीमें सदा तत्पर हो अवस्थित रहे