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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, Verse 58

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, verse 58 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 22 · श्लोक 58

संस्कृत श्लोक

कर्म कुर्वन्नकुर्वन्वा वीतरागो निरामयः । निर्मना नित्यनिर्वाणः पुमानात्मनि तिष्ठति ॥ ५८ ॥

हिन्दी अर्थ

(८) अथवा हे साधो श्रीरामचन्द्रजी, आज तक चिदात्मा के अभिमान से शून्य होने के कारण अचित्व शरीर हुए आपका-अचिदूप अज्ञान से स्फटिक पत्थर के अन्दर कल्पित आकाश की नाई- करोड़ों घनादिरूप भोग सामग्रियों के लाभ से भी परिपूर्ण नहीं हो रहा कामरूपी मन-छिद्र अब नित्यनिरतिशयानन्द पूर्णात्मा के लाभ से पूर्ण काम हो जाने के कारण, बाधित हुए वास्तविक स्फटिकचिद्र की नाई, एकमात्र आनन्दघन हो जाय, यह आशय है । इसीलिए विहित कर्मो का अनुष्ठान करने या न करने पर तत्त्वज्ञानियों के लिए को विशेष बात नही निकली, यह कहते हैं / वीतराग, मानसिक विकारों से रहित तत्त्वज्ञानी पुरुष चाहे कर्म करे या न करे, इससे उसमें कोई नयी बात नहीं आती, वह तो सर्वदा ही संकल्पशून्य एवं नित्यमुक्त होकर अपनी आत्मा में ही स्थित रहता है