Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, Verse 21
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, verse 21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 22 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
नासन्निवेशं हेमास्ति नासर्गं ब्रह्म विद्यते ।
किंतु सर्गादिशब्दार्थमुक्तं युक्तमतेः शिवम् ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
जले हुए तथा न जले हुए पट में अक्यकसाम्य की नाई काधितअकाधित जग्रत् के अवयवसास्य
का भान अज्ञानियों की तरह यद्यापि तत्वज्ञानियोः को भी होता रहे, तथापि तत्वज्ञानियो के लिए तो
वह एकमात्र बलह्मरूप ही है, इस आशय से कहते हैं ।
जैसे कटक, केयुर आदि रचनाविशेषरूप अर्थो से भिन्न सुवर्णं नहीं रहता, वैसे ही सृष्टिरूप
अर्थ से रहित ब्रह्म भी नहीं रहता यों ज्ञानी-अज्ञानी को मान-साम्य है। किन्तु तत्त्वज्ञानी को सृष्टि
आदि शब्दार्थ से रहित एकमात्र शिवरूप ही वह भासित होता है