Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, Verse 13
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, verse 13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 22 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
चेतनं बुध्यमानस्तु जीव एवावतिष्ठते ।
जीवो जीवितजीर्णेषु जातिजन्मसु जर्जरः ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
उत्तरार्ध का भी विवरण करते हैं /
(79) अथवा अचेतन यानी बुद्धि, स्थूल देह ओर चिदाभास इन तीनों से रहित कूटस्थ
अद्वितीय चैतन्मात्रस्वरूप अपने को समझकर जीव ब्रह्मस्वरूप बनकर स्थित रहता है ओर अपने
को चेतनरूप यानी बुद्धि, स्थूल देह एवं चिदाभासरूप समझकर तो जीव ही बनकर बैठता है यानी
पूर्णभाव को प्राप्त नहीं करता । चेतन शब्द के जो तीन अर्थ (बुद्धि, स्थूल देह ओर चिदाभास
हैं, वे व्युत्पत्तिभेद से किये गये हैं - (१) जीवः चेत्यते अनेन, (२) जीवः चेत्यते अस्मिन् और
(३) चेत्यते इति चेतनम् । अथवा यह जीव अचेतनरूप घटादि विषयों में चक्षु आदि की वृत्तियों
से जनित फलसम्बन्ध से शून्य होकर अपने को स्वप्रकाशचैतन्यरूप समझता हुआ परमात्मा बन
जाता है ओर उससे शून्य न हुआ जीव ब्रह्मभावापन्न नहीं होता ।)
परन्तु चेतन को अपनी आत्मा मे जानता हुआ यह जीव तो जीव ही बनकर जीवनो से जीर्णं
बन जानेवाले नानाविध योनियों के जन्मों में जर्जर होकर अवस्थित रहता हे