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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, Verse 7

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, verse 7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 22 · श्लोक 7

संस्कृत श्लोक

आविर्भावतिरोभावैर्भावाभावभवाभवैः । पश्चात्कारणतां यान्ति मिथः कारणकर्मभिः ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

आगे के वृद्धि आदि भावविकारों में भी कारण के न रहने से ही अस़त्त्त समझना चाहिए, इस आशय से कहते हैं । कारण के न रहने से अविद्यमान भी वे आविर्भाव, तिरोभाव, सत्ता, असत्ता, उत्पत्ति, नाश आदि विकारों से युक्त होकर विद्यमान-से हुए स्थित हैं, पीछे सृष्टिकाल में कारण के व्यापारों से वे परस्पर कारणता को प्राप्त होते हैं । यह बात सृष्टि के प्रारम्भ में नहीं हो सकती, क्योकि प्रलय में बीज और अंकुर दोनों का भी अभाव है