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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, Verse 2

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 22 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

ज्ञात्वा सम्यगनुज्ञानं दृश्यते येन कर्मसु । निर्वासनात्मकं ज्ञस्य स ज्ञानीत्यभिधीयते ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

जो ज्ञानी पुरुष अन्तःकरण के भोग्य विषयों में तथा उसकी चक्षु आदि द्वारा निर्गत ज्ञानात्मक वृत्तियों में साक्षीरूप से स्थित चैतन्यमात्र को यथार्थरूप जानकर बाधित दृश्य को वासनात्मना भी नहीं देखता वह ज्ञानी है अथवा जिस तत्त्व के ज्ञात होने से चित्त की समस्त वासनाएँ निकल जाती हे, उस तत्त्व को भलीभाँति जानकर स्थित हुए जिसकी सब प्राणियों के यथेष्ट व्यवहारो में भी अनुज्ञा (सम्मति) ही देखी जाती हो अर्थात्‌ अपना धन आदिका अपहरण करनेवाले चोरों की प्रवृत्ति का भी जो अनुमोदन करता हो, वह ज्ञानी है